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भौंर्या मो

कमलानाथ की कहानियां वायवीय दुनियां की नहीं, हमारे आसपास बिखरे संसार से चुनी गयी मानवीय संवेदना की वे कहानियां हैं जिनका आकर्षण, उनकी सरल सहज भाषा-शैली में तो सन्निहित है ही, वह मनुष्य के आंतरिक मन-संसार की टोह और खोज-खबर लेती अदम्य लेखकीय जिज्ञासा में भी है।यही वजह है कि (बिना किसी विलक्षण कहन-ढंग की ज्यादा परवाह किये भी) सुपरिचित और अनूठे व्यंग्यकार के रूप में जाने-माने कमलानाथ, अपनी इन सब कहानियों में देश-काल के अंतरों को पाटते हुए एक ऐसी कथा-सृष्टि निर्मित करते हैं जिसके पात्र और उनकी संवेदनाएं आमपाठक को अपनी विलक्षण अनुभव-यात्रा में न सिर्फ़ सीधे संबोधित करती हैं, बल्कि मानसिक तौर पर सम्बद्ध भी करती हैं।
जीवन को उसकी अन्तरंग विविधता में देखने का यह जो स्मृतिपरक-अंदाज़ कमलानाथ अपने तरीक़े से आज अपनी कहानी में आविष्कृत कर रहे हैं, वह बिना शोरगुल या धूम-धड़ाके के समकालिक हिन्दी कहानी में मानवीय आकांक्षाओं, उसकी विजयों और पराजयों, विवशताओं, शक्तियों और संभावनाओं- सब का आत्मीय पुनर्वास है।कमलानाथ की कुछेक अनूठी कहानियों का अंचल अनेकानेक रोचक ब्यौरों और विश्वसनीय अनुभवों के महीन धागों से बुना गया है।उसमें जहाँ छूट गए समयों के बिम्ब हैं तो रोज़मर्रा ज़िन्दगी में टकराने वाले कई ऐसे अप्रतिम पात्र, जो अपनी साधारण सरलता में भी असाधारण हैं।यह संयोग नहीं है कि सुपरिचित हिन्दी कवि-सम्पादक असद ज़ैदी ने कमलानाथ की कहानियों की इन्हीं सब विशिष्टताओं के चलते उनकी कहानी को “हिन्दी की आंचलिक-कथा में एक अद्भुत और अधिकृत स्वर” की संज्ञा दी है।
-हेमंत शेष
(प्रसिद्ध कवि, लेखक, समीक्षक)

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