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रूह को पनाह

'रूह को पनाह काव्य-माल में मोतियों-सी पिरोई कवितांए चमकती तो हैँ ही,साथ ही शीतलता भी प्रदान करती हैँ|इन कविताओ के माध्यम से प्रेम की जो अभिव्यक्ति हुई है वह अधुभूद है | एक ओर निःस्वार्थ प्रेम की धार दिल से फूटती है तो दूसरी ओर दैहिक प्रेम की दुर्गन्ध से मन विचलित हो जाता है | डॉ अंजू दुआ जैमिनी ने प्रेम के दोनों पहलुओं से परिचित कराया है | इन साधारण शब्दों के अर्थ अत्यंत गूढ है और यूँ भी अंजू शब्दों की बाजीगरी में सिद्धहस्त है | छोटी-छोटी कविताओं के माध्यम से अंजू ने समाज को सन्देश दिया है की निःस्वार्थ प्रेम की तालाश आज भी सबको रहती है | इन मंझी कविताओं ने वास्तविकता के धरातल पर प्रेम की मीठी अनुभूति करवाई जो निश्चित ही प्रशंशनीय है | शीर्षक 'रूह को पनाह' एकदम सटीक है और शीर्षक कविता दिल को छूने वाली है खुदा के सजदे में सिर नवाती सी कवितायेँ हैँ सभी |

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