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Chandavati - Badelte Gaon ki Tasveer A Novel by Dr. Bhartendu Mishra (चन्दावती - बदलते गाँवों की तस्वीर)

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स्वागत है चंदावती के हिन्दी संस्करण का | भारतेन्दु मिश्र का यह उपन्यास ‘चंदावती’ उत्तर भारत के समकालीन भारतीय गाँव का यथार्थ रूप प्रस्तुत करता है। यह उनके पहले अवधी उपन्यास ‘नई रोसनी’ का विस्तार है| इसमें एक नई कथा है और नए वातावरण में आज के भारत का गाँव साक्षात जीवंत हो जाता है। इस गाँव में सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक रूप में जो हो रहा है, उसका यथार्थ चित्रण चंदावती का प्रमुख उद्देश्य है जो पाठकों को तो आकर्षित करता ही है, इसके साथ उनके मन में कई प्रकार के असहज करने वाले प्रश्न भी खड़े करता है। लोक में रची-बसी संस्कृति का सूक्ष्म और मनोहारी वर्णन भी कथाकार की सफलता है। आज के बदलते गाँव की तस्वीर ‘चंदावती’ उपन्यास में इस तरह प्रस्तुत की गई है कि लेखक हमारे सामने आदर्श गाँव का एक स्वप्न भी निर्मित करता है। स्वप्न परिवर्तन का, स्वप्न एक नई व्यवस्था का, स्वप्न जाति-व्यवस्था के प्राचीन भँवर में फंसे समाज को उससे मुक्त करने का और सबसे ज़रूरी स्वप्न स्त्री की मुक्ति का- वह भी ग्रामीण स्त्री की मुक्ति का। ग्रामीण-स्त्री, जो शायद कुलीन स्त्री-विमर्श के केन्द्र में नहीं है। बहरहाल... चंदावती की कथा है एक बाल-विधवा लड़की चंदावती और गाँव के सभ्य, कुलीन और विधुर ब्राह्मण हनुमान शुक्ल की प्रेम कथा की, जिसकी परिणति अंतरजातीय विवाह में होती है। विवाह भी नए प्रकार का। यह उपन्यास असल में चंदावती की साहस गाथा है| यदि हमारी लड़कियाँ चंदावती की तरह साहस और विवेक से काम लें तो न सिर्फ़ उनके प्रति अपराध कम होंगे बल्कि उनके ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों को भी विराम लगेगा।
– डॉ.रवीन्द्र कात्यायन, अध्यक्ष हिन्दी विभाग, मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय, मुम्बई

‘ये ब्राह्मण टोलेवाले हमें जीने नहीं देंगे। कमलेश तिवारी और मिश्रा चाचा के विनोद ये दोनों तो पहले से ही हमारे पीछे पड़े हैं।’
‘अरे इनकी सबकी परवाह न करो। ये सब तो शादीशुदा हैं। लेकिन हनुमान दादा की पत्नी की मौत हो गई। उनकी कोई सन्तान भी नहीं है। आगे पूरा जीवन पड़ा है। तुम्हारे भाई कह रहे थे कि उनकी उम्र अभी 35 वर्ष से अधिक नहीं होगी।’
भौजी केवल उमर की बात नहीं है कहाँ हम विधवा तेलिन, कहाँ वो बीस बिसुवा के कन्नौजिया ब्राह्मण, वो अच्छे सम्पन्न किसान, ऊपर से पहलवान! उनकी तो नाक (प्रतिष्ठा) बड़ी है। कैसे होगा यह ब्याह। हमारे लिए गाँव में लड़ाई-झगड़ा हो यह मैं बिल्कुल नहीं चाहती। नरसिंह भगवान ने हमें जो यह गोरी चमड़ी और यह सुन्दर रूप दिया है, यही हमारा दुश्मन है। रजाना चन्दावती का मुँह ताकती खड़ी रही। फिर उसके चेहरे को सहलाते हुए उसे अपने सीने से लगा लिया। और बोली–अरे वाह बिटिया, तू तो बड़ी सयानी हो गई है री। इसकी चिन्ता न कर, जो कुछ भी होगा वह ब्राह्मण टोले में ही होगा। ‘नहीं भौजी परेशानी तो हमारे घर-परिवार और पूरे खानदान को होगी।’ ‘तो फिर यह शादी कैसे हो पाएगी। हम तो चाहते थे कि यह शादी हो जाती और तुम्हारा भी अपना घर-बार हो जाता।’ ‘देखो भौजी, हनुमान दादा के घरवाले और मुहल्लेवाले उनसे जो एक बार गाली-गलौज करेंगे तो हमको दस बार गाली देंगे। लड़ाई-झगड़ा, मारपीट, क़त्ल कुछ भी हो सकता है। गाँव का ही मामला है अगर कुछ दूरी होती तो भी ठीक होता।’ ‘फिर क्या होगा? कैसे होगा?... हनुमान दादा भले आदमी हैं।’ ‘तो ऐसा करो, हनुमान दादा को पहले हमारे घर बुलवा लो और सब लोग मिलकर उनसे साफ़-साफ़ बात कर लो। उनके मन में क्या है सब कुछ जान-समझ लो। हमारी हैसियत उनके जीवन में और उनके घर में क्या होगी; कल को कोई लड़का-बच्चा पैदा होगा तो उनके घर-जायदाद में उसका कुछ अधिकार होगा कि नहीं? मैं रखैल बनकर रहूँगी या उनकी घरवाली, ये सब बातें साफ कर लो।’
... इसी पुस्तक से ...

भारतेन्दु मिश्र–जन्म : 5 नवम्बर, 1959, लखनऊ l शिक्षा : एम.ए. (सौन्दर्यशास्त्र), पी-एच.डी. (दि.वि.वि.), l प्रकाशित कृतियाँ – कविता–1. पारो (गीत-नवगीत), 2. कालाय तस्मै नमः (सतसई), 3. अभिनवगुप्तपादाचार्य (खंडकाव्य), 3. अनुभव की सीढ़ी (समग्र गीत/नवगीत संग्रह), 4. कस परजवटि बिसारी (अवधी कविताएँ तथा ललित निबन्ध), 5. नवगीत एकादश (सम्पादित, ग्यारह नवगीतकारों का संकलन), 6. काव्याख्यान (लम्बी कविताएँ); आलोचना–1. अमरुशतक का साहित्य-शास्त्रीय अध्ययन (शोध-समीक्षा/पाठालोचन), 2. भरतकालीन कलाएँ (शोध-सन्दर्भ), 3. समकालीन छंद प्रसंग (आलोचना); कथा/उपन्यास–1. कुलांगना (उपन्यास), 2. बालयोगी अष्टावक्र (उपन्यास), 3. नयी रोसनी, 4. चन्दावती (अवधी उपन्यास), 5. खिड़की वाली सीट (कहानी-संग्रह); नाटक–1. शास्त्रार्थ, 2. मरे हुए लोग, 3. लड़की की जात, 4. दिल्ली चलो; जीवनी/परिचयात्मक पुस्तकें–1. भारतीय साहित्य के निर्माता ‘बलभद्र प्रसाद दीक्षित पढीस’ (साहित्य अकादमी के लिए मोनोग्राफ) 2. त्रिलोचन शास्त्री (उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा जन्म जयन्ती के अवसर पर प्रकाशित); शिक्षा के क्षेत्र में–1. बढ़ती जनसंख्या और शिक्षा 2. समावेशी शिक्षा अनुभव और प्रयोग; सम्पादित पुस्तकें–1. दस दिशाएँ 2. नूतन हस्ताक्षर 3. बतकही 4. कथा किहानी (अवधी कहनियों का संचयन) l सम्मान–साहित्य कला परिषद्, दिल्ली सरकार द्वारा ‘दिल्ली चलो’ नाटक के लिए पुरस्कार। (1997); ‘शास्त्रार्थ’ - पर सेठ गोविन्द दास सम्मान (2009) l अन्य गतिविधियाँ– साहित्य और शिक्षा से सम्बन्धित शताधिक राष्ट्रीय संगोष्ठियों में मुख्य वक्ता के रूप में भागीदारी; एन.सी.ई.आर.टी. की पाठ्य-पुस्तक निर्माण समिति में भागीदारी; एस.सी.ई.आर.टी. दिल्ली में 2003 से लगातार अध्यापक/प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भागीदारी; अनेक राष्ट्रीय साहित्यिक/ सांस्कृतिक मंचों (साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली, इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, नयी दिल्ली, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, भारत भवन, भोपाल, हिन्दी भवन, भोपाल, म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मलेन, दूरदर्शन, आकाशवाणी आदि) मंचों से रचनाओं/प्रपत्रों का पाठ एवं प्रकाशन l नाटक शास्त्रार्थ–अनेक भारतीय भाषाओं में आकाशवाणी द्वारा अभिनीत। डी.डी. भारती द्वारा ‘शास्त्रार्थ’ पर केन्द्रित ‘सृजन’ कार्यक्रम का प्रसारण - खिड़की वाली सीट (कहानी-संग्रह) पर धारवाड़ वि.वि. द्वारा एम.फिल. सम्पन्न l Blogs managed by-BHARTENDU MISHRA l http//wwwchha ndprasang.blogspot.com l http//natyapras ang.blogspot.com l http// awadhiprasang.blogspot. com l http//nishak tbachche.blogspot.com l सम्पर्क : सी-45/वाई-4, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-110095 l फोन : 9868031384 l ई-मेल : b.mishra59@gmail.com
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