लफ्ज़ बेज़ुबान
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'लफ्ज़ बेज़ुबान' का यह तीसरा संस्करण है। महज़ दो शब्दों से शुरू हुआ यह सफ़र कब इस किताब में बदल गया, शायद यह एहसास कभी हुआ ही नहीं | हर पल बस दिल में एक ख्याल आता रहा और यह कलम उस ख्याल को पन्नों पर लिखता गया | कुछ लोग मिले, कुछ दोस्त बने, मगर सबसे एक रिश्ता सा बना, और उस रिश्ते की नींव बने कुछ लफ्ज़ | किसी ने प्यार को शब्दों में पिरोया, किसी ने देशभक्ति पर नगमे लिखे, दुराचरियो पर कोई प्रहार कर गया महज़ चंद लफ़्ज़ों में ही, और किसी ने माता-पिता को अपनी कविताओं में याद कर लिया | सब एक ही राह पर, एक ही लक्ष्य की ओर, और एक ही कारवां पर सवार नज़र आए | उर्दू और हिंदी की मिठास को एक जरिया बनाकर बड़ी ही ख़ूबसूरती से सबने अपने अन्दर छुपे शायर को बाहर निकाला| हमें बहुत ख़ुशी है की हमें इन 25 खूबसूरत लेखक-लेखिकाओं के साथ काम करने का अनुभव मिला | हम आप सभी लेखक- लेखिकाओं का शुकिया अदा करना चाहते हैं, आपके इस किताब में बहुमूल्य योगदान के लिए | और हमे आशा है की आप सभी पाठक भी इस किताब के माध्यम से हम सब की कहानियों से कहीं ना कहीं खुद को जोड़ पाएंगे, हर लफ्ज़ को महसूस करेंगे |