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आप्तवाणी-१४(भाग -४)

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इस आप्तवाणी में दादाश्री द्वारा अनुभूत आत्मा के गुणधर्मों और स्वभाव का वर्णन है। थ्योरीटिकल और उतना ही प्रैक्टिकल, इन गुणों को उन्होंने कैसे उपयोग लिया, उन्हें वह बरता है और हमें भी उसे उपयोग में लेकर आत्मा में रहने की अद्भुत समझ दी है। और इन गुणों को उपयोग में लेकर सांसारिक परिस्थितियों में वीतरागता कैसे रख सके, ये बातें सिद्ध स्तुति के चैप्टर में हमें प्राप्त होती हैं। साथ ही, लौकिक मान्यताओं के सामने वास्तविकता क्या है ? और मान्यताओं की विभिन्न दशाओं में ये गुण-स्वभाव कैसे उपयोग में ले सकते हैं ? ज्ञानी पुरुष को ऐसे गुण-स्वभाव कैसे यथार्थ रूप से बरतते हैं ? और उससे आगे तीर्थंकर भगवंतों को सर्वोच्च दशा में कैसे बरतता होगा ? ये सभी बातें परम पूज्य दादाश्री के श्रीमुख से निकली हैं। और वे सभी यहाँ समाविष्ट हुई हैं।


To know more visit : dadabhagwan website

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