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Mere Sooraj Ka Tukda

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एक वंशगत अंतराल में

मैं छोटा सा पल, 

जीवनकाल को माना बस

संबंधों-त्योहारों का गुणाफल।

सौभाग्य से

भारती कृपा के संग,

बन एक भोर विभोर

रच डाले दो अंग,

भूमिका, प्रथम की

भारतवर्ष के पर्व

द्वितीय की जीवन प्रसंग।

 

पर जब आई

प्रज्ञ पाठकों को

सौंपने की बात,

मैं बन गई जैसे

नन्हे के गुरुकुल जाने के

एक दिवस पहले की रात।

 

तो विनती है रखने की

बस इतना सा ध्यान,

कि हर छंद मेरा

मेरे ह्रदय के अंश के समान।


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