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Mansa- Mann Meera Tan Krishna

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यह किताब लिखी नहीं गई - जी गई है।

समर्पित उन स्त्रियों को, जो प्रेम करती हैं... पर स्वयं को खोकर नहीं।

जो मीरासी भक्ति रखती हैं, पर अपनी पहचान भी संजोए रहती हैं।

इन कविताओं में प्रेम है - पर अधिकार नहीं,

विरह है - पर शिकायत नहीं।

यह एक स्त्री के मन की यात्रा है,

जो हर टूटन के बाद

अपने भीतर एक नया मंदिर बनाती है...

और अपने प्रिय को देवता मान लेती है।


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