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बिंबिसार: मगध का उदय

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गंगा के मैदान में साम्राज्य की शुरुआत अक्सर मौर्यों से जोड़ी जाती है, पर इस कहानी की असली नींव एक ऐसे राजा ने रखी थी, जिसका नाम आज अपेक्षाकृत कम याद किया जाता है – बिंबिसार। बुद्ध और महावीर के संरक्षक के रूप में प्रसिद्ध इस मगध नरेश ने केवल धर्म का नहीं, बल्कि राजनीति, प्रशासन और अर्थव्यवस्था का भी नया मानक बनाया।

यह पुस्तक बिंबिसार को न तो गौरवगाथा के नायक के रूप में गढ़ती है, न ही किसी संत की छवि में बाँधती है। यह उन्हें एक संपूर्ण मनुष्य के रूप में देखती है – दूरदर्शी राजा, चतुर कूटनीतिज्ञ, धर्म के प्रति उदार संरक्षक, और अंततः अपने ही पुत्र अजातशत्रु की महत्वाकांक्षा से पराजित एक अकेला पिता।

अंग की विजय से लेकर वेणुवन विहार के दान तक, कोसल और लिच्छवियों से विवाह‑संधियों से लेकर राजगृह की पहाड़ियों पर खड़ी “Cyclopean” दीवारों तक – यह यात्रा दिखाती है कि कैसे बिंबिसार ने युद्ध, व्यापार, भूगोल और धर्म – चारों को साधकर मगध को वह रूप दिया, जिस पर आगे चलकर नंदों और मौर्यों का विशाल साम्राज्य खड़ा हुआ।

यह किताब केवल घटनाओं का विवरण नहीं, बल्कि एक दृष्टि प्रस्तुत करती है – कि इतिहास में सत्ता और आध्यात्म, पिता और पुत्र, विजय और त्रासदी, सब एक साथ किस तरह जुड़ते हैं। यदि यह पुस्तक आपको मगध, बिंबिसार और गंगा घाटी के इतिहास को नए नज़रिये से सोचने पर मजबूर करे, तो इसका उद्देश्य पूरा हो जाता है।


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