"मैं नारी हूँ अबला नहीं "
यह कविता पुरुषाप्रधान समाज के उस पहलू पर लिखी गई हैं।
जिसमें नारीशक्ति को शक्ति से विरक्त रखा गया था।
तथा नारी के परिचय को किसी विशेष पक्ष समुदाय तथा समाज के आधीन कर दिया।
समाज में विकसित रीति-रिवाज रुड़ियों ने नारी को कमजोर अवता तथा शक्तिहीन का प्रतीक बना दिया।
किसके बाद भी एक नारी अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए इस समाज को अपना परिचय देती हैं।
'क्या लिखूं अपने बारे में
एक साधारण सी नारी हैं।
कैसे दु अपना परिचय में
दुनिया ने अबला कह कर
अक्षुणा कर दिया परिचय मेरा ।
फिर भी कहती हूं. मैं अबला नहीं हूं
एक साधारण सी नारी हैं।
सजाने सबरने से लेकर
आत्मनिर्भर बनाने का सफर तय करने वाली में।
कैसे कह दु कि में अबला नारी हूँ।
माना कि
कोमलता, शीतलता, निर्मलता तथा सहनशीलता गुण हो
सकते हैं नारी के
पर कमजोर अबला नारी कह कर अपमान मत करना मेरे
गुर्णा का
मत कहना तुम दुर्गा चंद्री अंबे
ना करना संबोधित 'देवी' कहकर
तुम समझना एक साधारण सी नारी
जी लड़ती है अपने अस्तित्व के लिए
जिसका जीवन त्याग, समर्पण, बलिदान पर हो आधारित
उसको तुम अपना कैसे कह सकते हो।
माना प्रकृति है नारी की
मधुर वाणी, कोमल नमन, क्षण भर में भावुक होना
पर ये अबला का प्रतीक तो नहीं है।
तुम ही बताओ
जिसका कार्य हो सृजन, पालन-पोषण करना
वह कैसे हो सकती है अबला
पुरुष प्रधान समाज में नारी को अबला कह कर अक्षुण्ण
कर दिया परिचय उसका
सदियों से परंपरा की बेड़ियों ने जकड़ा उनका अस्तित्व है।
रक्षा के नाम पर कीनी उनकी आजादी है।
शक्ति को बंधन में बांधकर निर्बल तुमने बनाया है।
फिर भी तुम कैसे कह सकते हो की नारी अबला है
मैं नारी हूँ
कोई अबला नहीं हु।"
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