"मैं नारी हूँ अबला नहीं " यह कविता पुरुषाप्रधान समाज के उस पहलू पर लिखी गई हैं। जिसमें नारीशक्ति को शक्ति से विरक्त रखा गया था। तथा नारी के परिचय को किसी विशेष पक्ष समुदाय तथा समाज के आधीन कर दिया। समाज में विकसित रीति-रिवाज रुड़ियों ने नारी को कमजो...
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बेड़ियाँ हाथ खुले थे, पाव खुले थे, पर विचार बंधे हुए थे। कहा गया कि तुम आजाद हो पर पिंजरे का दरवाजा नहीं था । ख़्वाब आसमान के दिखा कर हक जमीन पर भी नहीं दिया गया। दम तोड़ दिया ख्वाइशों ने रोते रोते पर ये विचारों की बेड़ियो को नहीं तोड़ पाई हाथ तो खु...
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