बनारस का जल्लाद
जब इतिहास हत्या करने लगे, तो कोई भी अतीत सुरक्षित नहीं है।
विक्रम सिंह एक भूत है। एक पूर्व-खुफिया ऑपरेटिव जिसे काबुल में एक विनाशकारी मिशन के बाद गद्दार करार दिया गया था, वह अब बनारस की पवित्र गलियों में गुमनामी का जीवन जी रहा है। उसका एकमात्र उद्देश्य है—जीवित रहना और अपने अतीत को दफन रखना। लेकिन जब वाराणसी के घाटों पर विदेशी पर्यटकों की लाशें मिलने लगती हैं, जिनकी छाती पर एक अजीब, अनुष्ठानिक चिह्न खुदा होता है, तो विक्रम को पता चलता है कि उसका अतीत उसे इतनी आसानी से नहीं छोड़ने वाला।
एक शक्तिशाली निगम द्वारा काम पर रखे जाने पर, विक्रम इस खूनी रहस्य की तह तक जाने की कोशिश करता है। उसकी जाँच उसे एक महत्वाकांक्षी आईपीएस अधिकारी, अंजलि चौहान, के रास्ते में ले आती है, जो उसे एक बाधा मानती है, और एक शक्तिशाली तांत्रिक, भैरवनाथ, के खतरनाक जाल में फँसा देती है, जिसका संरक्षण शहर का सबसे बड़ा बाहुबली ‘महाराज जी’ करता है। हर सुराग एक नई पहेली को जन्म देता है—एक भूली हुई रियासत ‘देवगढ़’, एक गुप्त समाज ‘संरक्षक’, और एक अमूल्य ‘लेजर’ जिसमें देश को हिला देने वाले राज़ छिपे हैं।
लेकिन असली मोड़ तब आता है जब विक्रम को पता चलता है कि यह सीरियल किलर कोई अजनबी नहीं है। वह विक्रम के सबसे दर्दनाक रहस्य को जानता है: एक बीस साल पुराना विश्वासघात और उसके दोस्त ज़ैन की मौत। यह हत्यारा विक्रम के साथ एक मनोवैज्ञानिक खेल खेल रहा है, उसे एक ऐसे चक्रव्यूह में खींच रहा है जहाँ हर मोड़ पर मौत उसका इंतज़ार कर रही है। अब, एक निलंबित अधिकारी और पूरे सिस्टम के खिलाफ, विक्रम को न केवल एक राष्ट्रीय साजिश को रोकना है, बल्कि अपने दोस्त के लिए प्रतिशोध भी लेना है। उसे बनारस का जल्लाद बनना होगा, ताकि वह असली जल्लाद को उसके अंजाम तक पहुँचा सके।