मुंबई का अंतक
आशा कॉलोनी की धूल भरी, निराशाजनक गलियों में एक सपना पल रहा था – वीर प्रताप सिंह का सपना, गरीबी और लाचारी से निकलकर मुंबई पर राज करने का सपना। यह १९८० का दशक था, जब शहर की कपड़ा मिलें बंद हो रही थीं और युवाओं के पास अपराध के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं था। वीर ने भी यही मार्ग चुना। जग्गा उस्ताद जैसे स्थानीय गैंगस्टर की शागिर्दी से शुरुआत कर, उसने जल्द ही अपनी क्रूरता और दुस्साहस का परचम लहराया। करण ‘कोबरा’ शर्मा, एक शांत किंतु अचूक निशानेबाज, उसका साथी बना, और दोनों ने मिलकर कानचनपुर में अपना आतंक स्थापित किया।
उनकी यह ‘सफलता’ उन्हें मुंबई के सबसे बड़े डॉन, सुल्तान मिर्ज़ा, और उसके एस-सिंडिकेट तक ले गई। वीर और कोबरा अब सिंडिकेट के प्रमुख सिपहसालार थे, जिनका नाम सुनकर बड़े-बड़े व्यापारी और बिल्डर काँप उठते थे। स्वर्ण हाइट्स के आलीशान ठिकाने से वे अपने ख़ौफ़ का कारोबार चलाते, उन्हें लगता था कि वे अपराजेय हैं। परंतु वीर की बढ़ती महत्वाकांक्षा और स्वतंत्र निर्णय लेने की प्रवृत्ति सुल्तान मिर्ज़ा की नज़रों में खटकने लगी थी। सिंडिकेट के भीतर ही, राजा भाई जैसा चालाक रणनीतिकार वीर के विरुद्ध साज़िश रच रहा था।
दूसरी ओर, एसीपी विक्रम राठौर जैसा ईमानदार और दृढ़ निश्चयी पुलिस अधिकारी वीर और उसके गिरोह को खत्म करने की कसम खा चुका था। जब वीर और उसके साथी स्वर्ण हाइट्स के ‘शांति कुटीर’ अपार्टमेंट में अपने अगले बड़े शिकार का इंतज़ार कर रहे थे, वे इस बात से अनजान थे कि वे स्वयं एक सुनियोजित जाल में फँस चुके हैं, एक ऐसा जाल जहाँ से निकलना नामुमकिन था। "मुंबई का अंतक" उस भयावह मुठभेड़, उसके पीछे की साज़िशों, और एक गैंगस्टर के उदय तथा उसके अवश्यंभावी पतन की एक अविस्मरणीय कहानी है। यह उपन्यास आपको अपराध, महत्वाकांक्षा, वफादारी, विश्वासघात और मानवीय भावनाओं के उस अंधकारमय संसार में ले जाएगा जहाँ हर साँस पर मौत का साया मंडराता है।