काल-जल
डॉ. अथर्व जोशी के लिए, इतिहास सिर्फ़ धूल भरी किताबों और ख़ामोश खंडहरों की दुनिया थी। एक अकादमिक साज़िश द्वारा अपना करियर और सम्मान खोने के बाद, उसने ख़ुद को इंदौर के एक म्यूज़ियम के पुरालेख में दफ़न कर लिया था। लेकिन जब शहर के सबसे शक्तिशाली उद्योगपति, विक्रम राठौर, की लाश एक सूखी, प्राचीन बावड़ी में मिलती है, तो अथर्व की दुनिया हमेशा के लिए बदल जाती है। यह कोई आम हत्या नहीं है। राठौर के माथे पर चंदन से एक रहस्यमयी प्रतीक बना है, और उसकी मौत का तरीक़ा मालवा की उस भूली हुई किंवदंती से मिलता है जिसे ‘जल-यक्ष’ कहते हैं—एक आत्मा जो पानी का अपमान करने वालों को भयानक सज़ा देती है।
एक निडर खोजी पत्रकार, मीरा शर्मा, जो इस मामले में एक बड़े कॉर्पोरेट घोटाले की गंध महसूस कर रही है, अथर्व की मदद माँगती है। अनिच्छा से, अथर्व इस ख़तरनाक खेल में शामिल हो जाता है। उनकी जाँच उन्हें नर्मदाकॉर्प नाम की एक शक्तिशाली कंपनी की ओर ले जाती है, जिसका विनाशकारी प्रोजेक्ट सिर्फ़ आदिवासियों की ज़मीन ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की जीवनदायिनी नदी को भी निगलने की धमकी दे रहा है। हर नई हत्या उन्हें किंवदंती के और क़रीब ले जाती है, और उन्हें एहसास होता है कि वे एक ऐसे हत्यारे का सामना कर रहे हैं जो ख़ुद को एक पौराणिक दंडाधिकारी मानता है।
लेकिन असली ख़तरा तब सामने आता है जब पता चलता है कि हत्यारा कोई प्रेत नहीं, बल्कि एक चालाक और क्रूर मास्टरमाइंड है जो हर किसी को अपने मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रहा है। अब अथर्व, मीरा, और एक आदिवासी रक्षक, मंगेश को न सिर्फ़ अपनी जान बचाने के लिए लड़ना है, बल्कि उन्हें ‘अवंती के गर्भ’ नामक एक प्राचीन रहस्य को भी उजागर करना है, एक ऐसा रहस्य जो पूरे क्षेत्र को तबाह कर सकता है। जब हर कोई दुश्मन हो और सच ख़ुद एक पहेली बन जाए, तो एक इतिहासकार अपने ज्ञान से अपनी दुनिया को कैसे बचाएगा?