द्रोण: प्रतिशोधक का उदय
क्या होता है जब एक महान ऋषि का पुत्र, जो ज्ञान के शिखर पर बैठा हो, उसे भरी सभा में उसकी निर्धनता के लिए अपमानित किया जाए? क्या होता है जब उसका सबसे प्रिय मित्र, जिसे उसने अपना भाई माना, वही उसे तिरस्कृत कर दे? आचार्य द्रोण की यह कहानी उसी एक प्रश्न का उत्तर है।
महर्षि भारद्वाज के आश्रम में जन्मा द्रोण, पांचाल-नरेश द्रुपद के साथ एक अटूट मित्रता के बंधन में बंधा था। उस मित्रता के आवेश में एक वचन दिया गया—आधे राज्य का वचन। किन्तु वर्षों बाद, जब एक निर्धन द्रोण अपने पुत्र के लिए केवल एक अंजलि दूध की आशा में अपने मित्र, राजा द्रुपद के दरबार में पहुँचता है, तो उसे मित्रता के स्थान पर घोर अपमान और तिरस्कार मिलता है। वह एक क्षण द्रोण के भीतर के ब्राह्मण की हत्या कर देता है और एक प्रतिशोधक को जन्म देता है।
दिव्यास्त्रों की असीम शक्ति अर्जित कर, वह हस्तिनापुर का राजगुरु बनता है। उसका एकमात्र लक्ष्य है—कुरु-वंश के राजकुमारों को एक ऐसी अजेय सेना में बदलना जो द्रुपद को उसके चरणों में लाकर डाल दे। अर्जुन की प्रतिभा उसका सबसे बड़ा शस्त्र बनती है, तो दुर्योधन की ईर्ष्या उसके मार्ग को और भी जटिल बना देती है। ‘द्रोण: प्रतिशोधक का उदय ’ एक ऐसे गुरु की महागाथा है, जिसका व्यक्तिगत प्रतिशोध कुरुक्षेत्र के महायुद्ध की नींव रख देता है। यह एक ऐसे पिता की कहानी है, जिसका पुत्र-मोह उसके धर्म पर भारी पड़ जाता है, और एक ऐसे व्यक्ति का वृत्तांत है जिसने शक्ति की खोज में, अपनी आत्मा को ही दाँव पर लगा दिया। यह उपन्यास उस कर्म-चक्र का अन्वेषण करता है, जो दिखाता है कि प्रतिशोध की अग्नि, अंततः उसे जलाने वाले को ही भस्म कर देती है।