गोदावरी की आँख
इतिहास गवाह है, सबसे बड़ी लड़ाइयाँ सोने के लिए नहीं, बल्कि कहानियों के लिए लड़ी जाती हैं।
सन् १६८७। दक्कन की सबसे धनी रियासत, गोलकुंडा, शहंशाह औरंगज़ेब की विशाल सेना के सामने घुटने टेक रही है। आठ महीनों की घेराबंदी ने शहर को एक भूखे, मरते हुए पिंजरे में बदल दिया है। लेकिन मुग़लों की असली प्यास ज़मीन के लिए नहीं, बल्कि उस पौराणिक ख़ज़ाने के लिए है जो इस क़िले की दीवारों में छिपा है: 'गोदावरी की आँख', एक ऐसा हीरा जिसकी चमक साम्राज्यों को बनाने और मिटाने की ताक़त रखती है। इस अमूल्य धरोहर का अंतिम संरक्षक है आचार्य ईशर, 'रत्नधार' घराने का एक रहस्यमयी जौहरी, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी इस पत्थर के रहस्यों की रक्षा में बिता दी है।
जब क्रूर और महत्त्वाकांक्षी कमांडर बोरहान आख़िरकार ईशर को पकड़ लेता है, तो वह उसके सामने एक क्रूर सौदा रखता है: हीरे का ठिकाना बताओ, या अपनी बेटी की जान से हाथ धो बैठो। अपनी कला और अपने ख़ून के बीच फँसा, ईशर एक ऐसी योजना बनाता है जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। वह जानता है कि हीरा कभी भी बोरहान के हाथ नहीं लगना चाहिए। इसलिए, वह एक ऐसा रास्ता चुनता है जो उसकी विरासत को या तो हमेशा के लिए बचाएगा, या उसे नष्ट कर देगा। वह 'गोदावरी की आँख' को तोड़ देता है और उसके पाँच टुकड़ों को अलग-अलग संरक्षकों तक पहुँचाने का एक ऐसा पहेली-भरा मार्ग बनाता है जिसे सिर्फ़ एक ही व्यक्ति सुलझा सकता है।
वह व्यक्ति है उसकी बिछड़ी हुई बेटी, लीला। एक प्रतिभाशाली चित्रकार, जिसने अपने पिता की रहस्यों और पत्थरों की दुनिया को सालों पहले छोड़ दिया था। अब, एक cryptic संदेश के माध्यम से, उसे एक ऐसे खेल में घसीट लिया जाता है जिसके नियम वह नहीं जानती। उसे उन पाँच संरक्षकों को ढूँढना है और उन टुकड़ों को इकट्ठा करना है, और यह सब उसे एक ऐसे शहर में करना है जहाँ हर साया दुश्मन है।
लेकिन लीला अकेली शिकारी नहीं है। एक और साया, विक्रम, उन टुकड़ों के पीछे है। वह कोई साधारण चोर या जासूस नहीं है; वह एक ऐसा योद्धा है जिसका अतीत ईशर के सबसे गहरे राज़ से जुड़ा है, और वह अपने परिवार के सम्मान पर लगे दाग़ को धोने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
जैसे-जैसे लीला अपने पिता के बनाए जाल में गहरी उतरती जाती है, उसे एहसास होता है कि वह सिर्फ़ हीरे के टुकड़ों को नहीं जोड़ रही है; वह एक ऐसे विश्वासघात की कहानी को जोड़ रही है जो दशकों पुराना है। उसे फ़ैसला करना होगा कि किस पर भरोसा किया जाए और क्या बलिदान किया जाए। गोलकुंडा की धधकती भट्टियों से लेकर महल के साज़िशी गलियारों तक, लीला की यह यात्रा सिर्फ़ एक ख़ज़ाने की खोज नहीं, बल्कि अपनी पहचान, अपने पिता के धर्म, और एक टूटी हुई विरासत के असली अर्थ की खोज है।