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चम्बल-गाथा: विद्रोह की ज्वाला

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१९६० का दशक। चम्बल के बीहड़। जहाँ बंदूकें बोलती हैं और जहाँ जीवन सस्ता है। इसी कठोर भूमि पर पले-बढ़े शिक्षित युवक अर्जुन सिंह के स्वप्न उस समय टूटकर बिखर जाते हैं जब स्थानीय जमींदार धीरेंद्र प्रताप सिंह उसकी पैतृक भूमि पर कब्ज़ा कर लेता है और विरोध करने पर उसके पिता की नृशंस हत्या कर दी जाती है। न्याय के सभी द्वार बंद पाकर, अर्जुन प्रतिशोध की अग्नि में जलता हुआ बीहड़ों की शरण लेता वहाँ वह अपने जैसे ही सताए हुए राम सिंह और लखन के साथ मिलकर एक छोटा सा विद्रोही दल बनाता है। अपने असाधारण साहस, न्यायप्रियता और ‘बाग़ी धर्म’ के सिद्धांतों के कारण वह शीघ्र ही ‘अर्जुन बाग़ी’ के नाम से पूरे चम्बल में प्रसिद्ध हो जाता है – शोषितों के लिए आशा की किरण, और अत्याचारियों के लिए मृत्यु का पर्याय। उसका संघर्ष उसे चतुर और निर्मम आरक्षी अधीक्षक विक्रम राठौड़ के सीधे टकराव में ले आता है, जो अर्जुन को समाप्त करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। साथ ही, उसे बीहड़ के पुराने, क्रूर डाकू सरदार भैरव सिंह गुर्जर की शत्रुता का भी सामना करना पड़ता है, जो अर्जुन के सिद्धांतों को अपनी सत्ता के लिए ख़तरा मानता है।



इन बाहरी संघर्षों के बीच, अर्जुन का हृदय देवगढ़ की साहसी और शिक्षित गौरी के प्रति स्नेह से भी भर उठता है, जो उसके कठोर जीवन में प्रेम और आशा का संचार करती है। किन्तु क्या एक बाग़ी के जीवन में प्रेम के लिए कोई स्थान है? क्या वह अपने दल की एकता को बनाए रख पाएगा, विशेषकर जब मंगल जैसा महत्वाकांक्षी सदस्य भीतरघात करने को तै"चम्बल-गाथा: विद्रोह की ज्वाला" केवल एक एक्शन और रोमांच से भरपूर उपन्यास नहीं, बल्कि यह मानवीय भावनाओं, नैतिक द्वंद्वों, सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष और एक व्यक्ति के असाधारण संकल्प की एक गहन और मार्मिक गाथा है। यह कहानी आपको चम्बल के उस युग में ले जाएगी जहाँ जीवन का प्रत्येक क्षण एक चुनौती था, और जहाँ न्याय की पुकार अक्सर बंदूक की आवाज़ में दब जाती थी।



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