हरी फाइल का भूत
क्या होता है जब एक सीधा-सादा आदमी एक पागल सिस्टम से टकराता है? वह या तो टूट जाता है, या सिस्टम से भी ज़्यादा पागल हो जाता है।
श्री एस. के. चौबे व्यवस्था के पुजारी हैं। संयुक्त सचिव के रूप में, उनकी दुनिया फाइलों के ढेर नहीं, बल्कि सैन्य परेड की सटीकता के साथ सजे नियमों का एक शांत साम्राज्य है, जहाँ हर कलम अपनी सही जगह पर होती है और हर निर्णय प्रक्रिया की पवित्र पुस्तक का पालन करता है।
लेकिन एक दिन, एक रहस्यमयी बेज रंग का ख़त सब कुछ बदल देता है। उन्हें 'राष्ट्रीय निद्रा मंत्रालय' का सचिव बना दिया जाता है - एक ऐसा मंत्रालय जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है, जिसका कोई ज्ञात उद्देश्य नहीं है, और जिसके पास ख़र्च करने के लिए पाँच सौ करोड़ रुपये का एक विशाल बजट है। उनका एक ही काम है: यह साबित करना कि उनका निरर्थक मंत्रालय वास्तव में आवश्यक है, और ऐसा करने का एकमात्र तरीका उस पैसे को ख़र्च करना है।
जब चौबे जी के सभी तर्कसंगत और समझदारी भरे प्रस्ताव एक के बाद एक नौकरशाही की बेतुकी दीवारों से टकराकर चूर-चूर हो जाते हैं, तो वह हताशा में एक ऐसी परियोजना का आविष्कार करते हैं जो इतनी मूर्खतापूर्ण है कि वह निश्चित रूप से विफल होनी चा'परियोजना केसरिया-बेज शांति', देश की सभी सरकारी इमारतों को एक ही, उबाऊ बेज रंग में रंगने की एक भव्य योजना।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी विफलता उनकी सबसे शानदार सफलता बन जाती है। यह बेतुका विचार जल्द ही राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बन जाता है, जो उन्हें अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सत्ता के ऐसे गलियारों में ले जाता है जहाँ तर्क एक विदेशी भाषा है। जैसे-जैसे बेज रंग की लहर देश भर में फैलती है, चौबे को एहसास होता है कि वह अब एक साधारण नौकरशाह नहीं हैं; वह बेतुकेपन के चेयरमैन बन गए हैं, एक ऐसे राक्षस की सवारी कर रहे हैं जिसे उन्होंने खुद बनाया है।
गौरव गर्ग का उपन्यास'हरी फाइल का भूत' एक हास्यप्रद और तीखा व्यंग्य है जो नौकरशाही की भूलभुलैया, सत्ता की प्रकृति, और एक ऐसे व्यक्ति की यात्रा पर प्रकाश डालता है जो अपनी विवेक को बचाने के लिए उसे खोने का जोखिम उठाता है। यह एक ऐसी कहानी है जो इतनी बेतुकी है कि सच हो सकती है, और यह आपको हँसाएगी, सोचने पर मजबूर करेगी, और शायद, अगली बार जब आप किसी सरकारी इमारत को देखें, तो आप उसके रंग पर सवाल ज़रूर उठाएंगे। हिए: