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दृष्टिकोण by सुधीर बंसल

कैसे ताल मिलाऊँ मैं
कुछ तो मेरी मजबूरी है|
कुछ मुझको जल्दी भी है।
फूल बनाने की कोशिश में|
कैसे कली खिलाऊँ मैं।
कुछ दिल पर चोटें ज्यादा हैं|
कुछ मन पहले से भरा हुआ।
नई चोट दिल पर लाने की|
कैसे गली बनाऊँ मैं।
कुछ तो जहन भी अलग-अलग है|
कुछ मन की भी दूरी है।
नजदीक रहा बेशक जीवन भर|
कैसे पास बुलाऊँ मैं।
कुछ तो दिल में उमंग नहीं है|
कुछ मन पहले से मरा हुआ।
नई चाल में आने वाला|
कैसे ताश बनाऊँ मैं।|
कुछ तो चुप्पी साध रखी है|
कुछ मन की भी थाह नहीं है।
उसका जहन बनाने वाली|
कैसे बात बनाऊँ मैं।
कुछ देर है सावन के आने में|
कुछ धरती सारी तपी हुई है।
धरती पर स्त्रोत बनाने वाली|
कैसे लात बनाऊं मैं||

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